दवाओं के साथ ‘पोषण पोटली’ बनी टीबी मरीजों का संबल
18 Jun 2026

दवाओं के साथ ‘पोषण पोटली’ बनी टीबी

बहराइच, 17 जून 2026:  राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य विभाग ने अब दवाओं के साथ पोषण को भी उपचार का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। जिला टीबी अस्पताल की ओपीडी में ऐसे मरीजों को जिनका वजन और बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) सामान्य से काफी कम पाया जा रहा है उन्हें दवाओं के साथ पोषण पोटली भी उपलब्ध कराई जा रही है। आर्थिक रूप से कमजोर और कुपोषित टीबी मरीजों के लिए यह पहल उम्मीद का नया सहारा बन रही है।

सीएमओ डॉ. संजय कुमार और जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एम.एल. वर्मा की पहल पर 1 जून 2026 से यह अभियान शुरू किया गया है। विशेष बात यह है कि दोनों अधिकारी अपने निजी सहयोग से इन पोटलियों की व्यवस्था कर रहे हैं। शुरुआती 15 दिनों में 25 जरूरतमंद मरीजों तक यह सहायता पहुंचाई जा चुकी है।

पोटली में क्या है खास?-

करीब एक माह तक चलने वाली इस पोषण पोटली को तैयार करने में लगभग 500 रुपये का खर्च आता है। इसमें मूंगफली, भुना चना, सोयाबीन बड़ी और गुड़ जैसी प्रोटीन एवं ऊर्जा से भरपूर सामग्री शामिल की गई है। यह सामग्री मरीजों के गिरते वजन को नियंत्रित करने, शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा देने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक है।

दवा न छोड़ने की अनूठी व्यवस्था-

जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एम.एल. वर्मा ने बताया कि मरीज को अगली पोटली एक माह बाद अस्पताल आने पर ही दी जाएगी। इस दौरान उसके वजन और बीएमआई की दोबारा जांच की जाएगी तथा यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि वह नियमित रूप से दवाओं का सेवन कर रहा है। इससे मरीजों द्वारा उपचार बीच में छोड़ने की प्रवृत्ति पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।

चावल-दही से नहीं होती खांसी-

डॉ. वर्मा ने समाज में फैली भ्रांतियों को खारिज करते हुए कहा कि टीबी मरीजों को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती है, लेकिन गलत धारणाओं के कारण कई मरीज खांसी के डर से चावल, दही और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों का सेवन बंद कर देते हैं। इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि खांसी चावल खाने से नहीं, बल्कि टीबी के बैक्टीरिया की वजह से होती है। शुगर के मरीजों को छोड़कर अधिकांश टीबी मरीजों को भोजन में अनावश्यक परहेज नहीं करना चाहिए, बल्कि अधिक से अधिक प्रोटीनयुक्त और संतुलित आहार लेना चाहिए।

सामाजिक सहयोग की अपील-

भारत सरकार के निक्षय पोर्टल और केंद्रीय क्षय रोग विभाग के आंकड़ों के अनुसार, देश में उपचार शुरू होने के समय 50 प्रतिशत से अधिक टीबी मरीज कुपोषण से ग्रस्त पाए जाते हैं। वहीं डब्ल्यूएचओ और लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 55 प्रतिशत पुरुषों और 61.5 प्रतिशत महिलाओं में टीबी का सबसे बड़ा जोखिम कारक कुपोषण है।

सीएमओ डॉ. संजय कुमार ने इस पहल को व्यापक बनाने के लिए सामाजिक संगठनों, व्यापारियों, उद्योगपतियों और प्रबुद्ध नागरिकों से आगे आने की अपील की है। उन्होंने कहा कि टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि उपचार, पोषण और सामाजिक सहयोग के संयुक्त प्रयासों से ही हासिल किया जा सकता है।

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